2015 में लोकल ट्रेन से गिरकर मरे व्यक्ति के परिजन को बॉम्बे हाईकोर्ट ने 8.14 लाख रुपये मुआवजा देने का दिया आदेश

 

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि रेलवे केवल अपनी आंतरिक रिपोर्ट के आधार पर मुआवजा देने से इन्कार नहीं कर सकता। खासकर तब, जब इस दावे के समर्थन में कोई प्रत्यक्षदर्शी या अन्य स्वतंत्र सबूत मौजूद न हो। कोर्ट ने रेलवे को 2015 में लोकल ट्रेन से गिरकर जान गंवाने वाले 26 वर्षीय युवक के माता-पिता को 8.14 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।

जस्टिस आरती साठे ने यह आदेश राहुल वामन सूर्यवंशी के माता-पिता की ओर से दायर मुआवजा याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। राहुल महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (MIDC) में कार्यरत थे और अपने परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे।

मामले के अनुसार, राहुल सूर्यवंशी ने 22 मार्च 2015 को नवी मुंबई के घणसोली से ऐरोली जाने वाली लोकल ट्रेन पकड़ी थी। बाद में वह घणसोली और रबाले रेलवे स्टेशनों के बीच किलोमीटर 43/4 के पास घायल अवस्था में मिले। उन्हें वाशी के एक नगर निगम अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

रेलवे ने मुआवजे के दावे का विरोध करते हुए डिविजनल रेलवे मैनेजर (DRM) की रिपोर्ट और स्टेशन मास्टर के मेमो का हवाला दिया। इन दस्तावेजों में कहा गया था कि एक अज्ञात व्यक्ति रेलवे ट्रैक पर अतिक्रमण करते समय ट्रेन की चपेट में आ गया था।

रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने रेलवे के इस पक्ष को स्वीकार करते हुए 2019 में राहुल के माता-पिता का मुआवजा दावा खारिज कर दिया था। इसके बाद माता-पिता ने ट्रिब्यूनल के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस साठे ने कहा कि इस बात को साबित करने के लिए “बिल्कुल कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं” था कि राहुल ट्रेन की चपेट में आने के समय रेलवे ट्रैक पार कर रहे थे। कोर्ट ने इनक्वेस्ट पंचनामा का भी उल्लेख किया, जिसमें दर्ज था कि राहुल “अज्ञात लोकल ट्रेन से गिर गए थे।” उनके शव से रेलवे का टिकट भी मिला था।

हाईकोर्ट ने कहा कि DRM की रिपोर्ट में केवल यह संभावना जताई गई थी कि घटना ट्रैक पार करते समय “हो सकती है”। स्वतंत्र साक्ष्य के समर्थन के बिना इस रिपोर्ट को निर्णायक सबूत नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यात्री ट्रेन से दुर्घटनावश गिरना रेलवे अधिनियम की धारा 123(c)(2) के तहत “अनटुवर्ड इंसीडेंट” (अवांछित घटना) माना जाता है। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने कानून की “संकीर्ण और गलत व्याख्या” की थी।

हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द करते हुए रेलवे को राहुल सूर्यवंशी के माता-पिता को 8,14,641 रुपये बराबर-बराबर हिस्से में देने का निर्देश दिया। यह राशि आठ सप्ताह के भीतर उनके बैंक खातों में जमा करनी होगी।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मुआवजे के भुगतान में देरी होने पर रेलवे को 9 प्रतिशत सालाना की अतिरिक्त ब्याज दर से भुगतान करना होगा।

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